गाँव की दीवारों से दुनिया तक पहुँची गोंड कला | ₹18 करोड़ में बिकी पेंटिंग

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गाँव की दीवारों से दुनिया तक पहुँची गोंड कला | ₹18 करोड़ में बिकी पेंटिंग

जंगढ़ सिंह श्याम: गाँव की दीवारों से दुनिया तक पहुँची गोंड कला, ₹18 करोड़ में बिकी पेंटिंग

मध्य प्रदेश के छोटे से गाँव पाटनगढ़ से निकले जंगढ़ सिंह श्याम ने अपने समुदाय की कहानियों, प्रकृति और आध्यात्मिक विश्वासों को ऐसी चित्रभाषा दी, जिसने समकालीन भारतीय कला में एक नई पहचान बनाई। सितंबर 2026 में उनकी एक पेंटिंग की ₹18 करोड़ की नीलामी ने उनकी विरासत की ओर फिर ध्यान खींचा।

किसी कलाकार की पहचान उसकी पेंटिंग की कीमत से कहीं बड़ी होती है। जंगढ़ सिंह श्याम की कहानी भी ऐसी ही है। उनके चित्रों में जंगल, पशु-पक्षी और लोकविश्वास दिखाई देते हैं, लेकिन इन आकृतियों के भीतर एक समुदाय की स्मृतियाँ और जीवन को देखने का उसका अपना नजरिया मौजूद है।

जंगढ़ ने अपनी सांस्कृतिक जड़ों से प्रेरणा लेकर एक मौलिक कलात्मक संसार रचा। उनकी कला ने यह दिखाया कि आदिवासी कलाकार की व्यक्तिगत कल्पना और अभिव्यक्ति समकालीन कला जगत में कितनी महत्वपूर्ण जगह रखती है।

पाटनगढ़ से शुरू हुई यात्रा

जंगढ़ सिंह श्याम का जन्म 1962 में मध्य प्रदेश के पाटनगढ़ गाँव में हुआ था। वे परधान-गोंड समुदाय से आते थे। गाँव के घरों की दीवारों पर चित्र बनाने से शुरू हुई उनकी यात्रा आगे चलकर कागज और कैनवास तक पहुँची।

उनके लिए आसपास का जीवन ही प्रेरणा का स्रोत था। जंगलों के जीव, पेड़-पौधे, समुदाय की कथाएँ और देवी-देवताओं से जुड़े विश्वास उनके चित्रों का हिस्सा बने। गोंड सांस्कृतिक परंपरा में प्रकृति, लोककथाओं और आध्यात्मिक जीवन के बीच गहरा संबंध है; जंगढ़ की कला इसी संबंध को देखने का एक नया माध्यम बनी।

भारत भवन में मिला नया अवसर

1980 के दशक में भोपाल के भारत भवन से जुड़े कलाकार जगदीश स्वामीनाथन और उनकी टीम ग्रामीण क्षेत्रों में आदिवासी कलाकारों की तलाश कर रहे थे। इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र के विवरण के अनुसार, स्वामीनाथन के एक छात्र ने गाँव के एक घर की दीवार पर जंगढ़ का बनाया चित्र देखा और उनसे कागज पर रंगों से चित्र बनाने को कहा। उनकी प्रतिभा को पहचान मिलने के बाद भारत भवन से उनका जुड़ाव बना।

यह अवसर उनकी कलायात्रा का महत्वपूर्ण मोड़ था। नए माध्यमों ने उन्हें अपनी कल्पना को विस्तार देने की जगह दी। दीवारों से निकलकर उनकी चित्रभाषा ऐसे दर्शकों तक पहुँची, जो उनके समुदाय की कहानियों और कलात्मक दृष्टि से पहले परिचित नहीं थे।

‘जंगढ़ कलम’ की विशिष्ट पहचान

जंगढ़ के चित्रों में बिंदुओं, रेखाओं और दोहराए जाने वाले पैटर्न का विशेष महत्व था। पशु-पक्षियों और प्राकृतिक आकृतियों के भीतर इनका संयोजन चित्रों को एक अलग लय देता था। उनकी विशिष्ट शैली आगे चलकर ‘जंगढ़ कलम’ के नाम से पहचानी गई।

उनकी उपलब्धि परंपरा को नए माध्यम पर उतारने तक सीमित नहीं थी। उन्होंने उससे संवाद करते हुए अपनी व्यक्तिगत चित्रभाषा विकसित की। यही कारण है कि उनके चित्र सांस्कृतिक स्मृतियों से जुड़े होने के साथ एक कलाकार की स्वतंत्र कल्पना भी व्यक्त करते हैं।

जंगढ़ समकालीन गोंड कला के अग्रणी कलाकारों में गिने जाते हैं। उनके काम ने देश की सीमाओं से बाहर भी दर्शक पाए और अंतरराष्ट्रीय प्रदर्शनियों में स्थान हासिल किया।

सितंबर 2026 की ऐतिहासिक नीलामी

24 सितंबर 2026 को मुंबई की पुंडोले गैलरी में जंगढ़ सिंह श्याम की 1999 में बनी एक शीर्षकहीन ऐक्रेलिक कैनवास पेंटिंग की अंतिम बोली ₹18 करोड़ लगी। यह कलाकार के लिए नया नीलामी रिकॉर्ड था। बिक्री से पहले इसका अनुमानित मूल्य ₹4 से ₹6 करोड़ रखा गया था।

यहाँ ₹18 करोड़ हैमर प्राइस, यानी अंतिम बोली की राशि है; खरीदार का अतिरिक्त शुल्क इससे अलग होता है। लगभग 91 × 69 इंच की इस कृति में एक आध्यात्मिक आकृति के साथ साँप, पक्षी और वृक्ष दिखाई देते हैं।

इस बिक्री ने जंगढ़ की कला के बाजार मूल्य को नई ऊँचाई दी। साथ ही, इसने उस कलाकार के योगदान पर दोबारा चर्चा का अवसर बनाया, जिसने अपने समुदाय की दृश्य परंपराओं को व्यापक कला जगत तक पहुँचाया था।

अगली पीढ़ी को दी प्रेरणा

जंगढ़ की विरासत उनके अपने चित्रों से आगे भी जाती है। उनकी पत्नी ननकुसिया श्याम ने उनसे चित्रकला सीखी। शुरुआत में जंगढ़ उन्हें अपने बनाए चित्रों में रंग भरने के लिए प्रोत्साहित करते थे।

उन्होंने अन्य कलाकारों का भी उत्साह बढ़ाया। दुर्गाबाई व्याम के काम से प्रभावित होकर उन्होंने उन्हें चित्र बनाने के लिए प्रेरित किया, जबकि भज्जू श्याम उन्हें अपने मार्गदर्शक के रूप में याद करते हैं। इस तरह उनकी कलायात्रा ने दूसरों के लिए भी संभावनाएँ खोलीं।

कीमत से कहीं बड़ी सांस्कृतिक विरासत

जंगढ़ सिंह श्याम का निधन 2001 में जापान में हुआ। उनका जीवन छोटा रहा, लेकिन उनके काम का प्रभाव आज भी दिखाई देता है।

2026 में उनके निधन के पच्चीस वर्ष पूरे होने पर उनकी कला को मिली नई चर्चा हमें उनके योगदान को गहराई से समझने का अवसर देती है। ₹18 करोड़ का रिकॉर्ड एक महत्वपूर्ण खबर है, लेकिन उनकी सबसे बड़ी उपलब्धि उन कहानियों और विश्वासों को दृश्य रूप देना है, जिनसे उनका समुदाय अपना संबंध महसूस करता था।

जंगढ़ की कहानी भारतीय कला में आदिवासी कलाकारों के योगदान को सम्मान और गंभीरता से देखने का आग्रह करती है। उनके कैनवास आज भी बताते हैं कि स्थानीय अनुभवों से जन्मी कला दुनिया भर के दर्शकों से संवाद कर सकती है।

जंगढ़ सिंह श्याम ने अपने चित्रों में कहानियाँ रचीं—और उन कहानियों के जरिए एक संस्कृति को नया कैनवास दिया।

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