सत्यशोधक आंदोलन से पूना पैक्ट और राज्य समाजवाद तक

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सत्यशोधक आंदोलन से पूना पैक्ट और राज्य समाजवाद तक

24 सितंबर बहुजन चेतना के इतिहास में दो महत्वपूर्ण घटनाओं की याद दिलाता है। 1873 में इसी दिन महात्मा जोतिबा फुले ने सत्यशोधक समाज की स्थापना की और 1932 में इसी तारीख को पूना पैक्ट हुआ। पहली घटना सामाजिक मुक्ति के संगठित प्रयास का प्रतीक है; दूसरी स्वतंत्र राजनीतिक प्रतिनिधित्व पर गंभीर बहस का केंद्र। दोनों को साथ पढ़ने से शिक्षा, संगठन और सत्ता में भागीदारी के संबंध स्पष्ट होते हैं।

इस लेख में ‘मूलनिवासी बहुजन’ शब्द सामाजिक आंदोलन की वैचारिक भाषा में प्रयुक्त है। इसे 1932 के दस्तावेजों में प्रयुक्त ‘Depressed Classes’ की श्रेणी या किसी निश्चित जनसंख्या प्रतिशत का समानार्थी नहीं समझना चाहिए।

नायक पूजा से आगे, विचारों की पहचान

डॉ. बाबा साहेब आंबेडकर ने 25 नवंबर 1949 के संविधान सभा भाषण में राजनीति की नायक पूजा को लोकतंत्र के लिए खतरा बताया था। उनकी चेतावनी का आशय यह था कि किसी नेता के प्रति श्रद्धा नागरिक विवेक और संस्थागत जवाबदेही की जगह नहीं ले सकती।

समाज अपने मार्गदर्शकों को उनके विचारों, निर्णयों और वंचित लोगों के जीवन पर पड़े प्रभाव से पहचाने। फुले और आंबेडकर का सम्मान उनके चित्रों और जयंतियों के साथ उनके समता के कार्यक्रम को आगे बढ़ाने में भी दिखाई देना चाहिए।

24 सितंबर 1873: सत्यशोधक समाज और सामाजिक मुक्ति

महात्मा जोतिबा फुले ने पुणे में सत्यशोधक समाज की स्थापना की। इस आंदोलन ने जातिगत ऊँच-नीच, धार्मिक वर्चस्व और सामाजिक अन्याय को चुनौती दी। महिलाओं, किसानों और वंचित समुदायों की शिक्षा तथा अधिकार उसके काम के केंद्र में थे।

सत्यशोधक दृष्टि ने मनुष्य की गरिमा को जन्म से निर्धारित सामाजिक दर्जे से ऊपर रखा। सावित्रीबाई फुले की शिक्षा और सामाजिक सुधार की भूमिका भी इस विरासत का आवश्यक हिस्सा है। बहुजन चेतना के लिए इसका संदेश है कि मुक्ति का संघर्ष ज्ञान और संगठन दोनों से आगे बढ़ता है।

सुधार आंदोलनों की अलग दिशाएँ

सत्यशोधक समाज के बाद 10 अप्रैल 1875 को स्वामी दयानंद सरस्वती ने बंबई, वर्तमान मुंबई, में आर्य समाज स्थापित किया। उसकी स्थापना पुणे में हुई थी—यह दावा सही नहीं है।

आर्य समाज ने वेदों को आधार बनाकर धार्मिक और सामाजिक सुधार की दिशा अपनाई। फुले की आलोचना और वैदिक पुनर्व्याख्या के इस रास्ते में महत्वपूर्ण वैचारिक अंतर था। बहुजन दृष्टि से इन अंतरों की समीक्षा की जा सकती है, लेकिन आर्य समाज को ‘प्रतिक्रांति’ कहना एक वैचारिक मूल्यांकन है। किसी आंदोलन की आलोचना उसके विचारों और कार्यों के आधार पर होनी चाहिए, संस्थापक की जन्मजात पहचान के आधार पर नहीं।

23 सितंबर 1917: बड़ौदा का संकल्प

भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय की सूचना के अनुसार, डॉ. बाबा साहेब आंबेडकर ने 23 सितंबर 1917 को वडोदरा की संकल्प भूमि पर अस्पृश्यता मिटाने का संकल्प लिया था।

इस प्रसंग का महत्व जातिगत अपमान के विरुद्ध उनके जीवन संघर्ष में है। हालांकि इस संकल्प के नाम पर प्रचलित लंबे, आत्मविनाश संबंधी कथन को प्रमाणित शब्दशः उद्धरण के रूप में प्रस्तुत करना उचित नहीं होगा। उनका सामाजिक संदेश स्पष्ट है: शिक्षा के साथ गरिमा और बराबरी के लिए संगठित संघर्ष भी आवश्यक है।

24 सितंबर 1932: पूना पैक्ट और प्रतिनिधित्व का प्रश्न

गोलमेज सम्मेलनों में डॉ. बाबा साहेब आंबेडकर ने दलित समुदायों के स्वतंत्र राजनीतिक प्रतिनिधित्व का पक्ष रखा। 1932 के कम्युनल अवॉर्ड में अलग निर्वाचक मंडल की व्यवस्था आई। महात्मा गांधी ने इसके विरोध में पुणे की यरवडा जेल में आमरण अनशन किया। अनशन से उत्पन्न दबाव और वार्ताओं के बीच 24 सितंबर 1932 को पूना पैक्ट हुआ।

समझौते ने अलग निर्वाचक मंडल के स्थान पर संयुक्त निर्वाचक मंडल और आरक्षित सीटों की व्यवस्था की। प्रांतीय विधानमंडलों में 148 सीटें आरक्षित की गईं। इसलिए यह कहना अधूरा है कि सभी अधिकार समाप्त हो गए। असली विवाद स्वतंत्र राजनीतिक चयन की व्यवस्था खोने और व्यापक मतदाता समूह पर निर्भरता बढ़ने का था।

आंबेडकरवादी आलोचना का केंद्रीय प्रश्न आज भी प्रासंगिक है: क्या प्रतिनिधि वंचित समुदायों की आवाज स्वतंत्र रूप से उठा सकते हैं? कुछ बहुजन धाराएँ इस तारीख को अधिकारों की क्षति के दिन के रूप में देखती हैं। यह राजनीतिक मूल्यांकन है; इसे ‘भारत की 90 प्रतिशत आबादी के लिए प्रमाणित काला दिन’ जैसे सांख्यिकीय तथ्य के रूप में नहीं लिखा जाना चाहिए।

राष्ट्रीयकरण से राज्य समाजवाद तक

डॉ. बाबा साहेब आंबेडकर का कार्यक्रम राजनीतिक प्रतिनिधित्व से आगे आर्थिक लोकतंत्र तक जाता था। उनके 1947 के दस्तावेज ‘States and Minorities’ में प्रमुख और बुनियादी उद्योगों के राज्य स्वामित्व, बीमा के राज्य एकाधिकार तथा कृषि को राज्य उद्योग बनाने के प्रस्ताव थे। कृषि के लिए सामूहिक खेती, जाति से परे भागीदारी और राज्य द्वारा संसाधन उपलब्ध कराने की रूपरेखा भी थी।

राष्ट्रीयकरण स्वामित्व को राज्य के हाथ में लाने का उपाय है। राज्य समाजवाद उत्पादन और संसाधनों को सामाजिक हित में व्यवस्थित करने की व्यापक व्यवस्था है। इसलिए केवल सरकारी स्वामित्व से बराबरी की गारंटी नहीं मिलती; जवाबदेही और लाभों का न्यायपूर्ण वितरण भी आवश्यक हैं। यह मॉडल उनका प्रस्ताव था, जिसे अंतिम संविधान ने संपूर्ण रूप में नहीं अपनाया।

शिक्षित समाज की जिम्मेदारी

संवैधानिक आदर्शों और सामाजिक जीवन के बीच दूरी पर सवाल उठाना जरूरी है। लेकिन पूरे शिक्षित बहुजन वर्ग को योगदानहीन कहना उस वर्ग के भीतर चल रहे विविध प्रयासों की अनदेखी होगी। बेहतर प्रश्न है कि शिक्षा को सामाजिक जिम्मेदारी में कैसे बदला जाए।

छात्रों को मार्गदर्शन देना, संविधान अध्ययन समूह चलाना, भेदभाव के विरुद्ध पीड़ितों का साथ देना और प्रतिनिधियों से जवाबदेही माँगना व्यावहारिक रास्ते हैं। सार्वजनिक शिक्षा, स्वास्थ्य और आर्थिक अवसरों पर तथ्यपूर्ण चर्चा भी इस काम का हिस्सा हो सकती है।

24 सितंबर की ऐतिहासिक विरासत हमें नेताओं के मूल्यांकन, प्रतिनिधित्व की गुणवत्ता और आर्थिक न्याय को एक साथ समझने का अवसर देती है। फुले और आंबेडकर के विचारों की सार्थकता तभी बढ़ेगी जब समाज स्मरण को शिक्षा, संगठन और लोकतांत्रिक कार्रवाई से जोड़ेगा।

  • Sunil Kumar Mulnivasi (Bahujan)

स्रोत

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