बाबासाहेब की अस्थियों को लेकर बढ़ा विवाद: बहुजन समाज में आक्रोश, चंद्रशेखर आज़ाद ने दी आंदोलन की चेतावनी
उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में डॉ. भीमराव आंबेडकर की पवित्र अस्थियों से जुड़े स्थल को लेकर बहुजन समाज में गहरा आक्रोश देखा जा रहा है। रिपोर्ट्स के अनुसार, हजरतगंज स्थित बोधिसत्व आंबेडकर महासभा को स्थानांतरित करने की संभावित योजना ने सामाजिक और राजनीतिक हलकों में बड़ी बहस छेड़ दी है। बहुजन संगठनों का कहना है कि यह केवल एक भवन या जमीन का मामला नहीं, बल्कि करोड़ों लोगों की आस्था, इतिहास और आत्मसम्मान से जुड़ा विषय है।
क्यों महत्वपूर्ण हैं बाबासाहेब की अस्थियां?
डॉ. भीमराव आंबेडकर के महापरिनिर्वाण (1956) के बाद उनकी अस्थियों के कुछ हिस्से देशभर के विभिन्न स्थानों पर स्थापित किए गए थे, ताकि लोग उन्हें श्रद्धांजलि दे सकें और उनके विचारों से प्रेरणा प्राप्त कर सकें। उत्तर प्रदेश में दो प्रमुख स्थलों पर बाबासाहेब की अस्थियां सुरक्षित रखी गई हैं:
1. डॉ. भीमराव आंबेडकर सामाजिक परिवर्तन स्थल, गोमती नगर
यह लखनऊ का विशाल स्मारक है, जहां मुख्य गुंबद के नीचे बाबासाहेब की पवित्र अस्थियां स्थापित हैं। यह स्थान बहुजन आंदोलन और सामाजिक न्याय के प्रतीक के रूप में जाना जाता है।
2. बोधिसत्व आंबेडकर महासभा, 10 विधान सभा मार्ग, हजरतगंज
यह ऐतिहासिक स्थल विशेष महत्व रखता है। यहां डॉ. सविता आंबेडकर द्वारा स्थापित अस्थि कलश, ऐतिहासिक बोधि वृक्ष और अन्य श्रद्धास्थल मौजूद हैं। यह स्थान उत्तर प्रदेश में आंबेडकरवादी आंदोलन का एक प्रमुख केंद्र माना जाता है।
हर वर्ष 6 दिसंबर, महापरिनिर्वाण दिवस पर लाखों अनुयायी इन स्थलों पर पहुंचकर बाबासाहेब को श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं।
बहुजन समाज में क्यों है नाराजगी?

बहुजन समाज का मानना है कि हजरतगंज स्थित आंबेडकर महासभा को हटाना या स्थानांतरित करना उनकी भावनाओं पर सीधा आघात होगा। लोगों का कहना है कि यह स्थल केवल एक इमारत नहीं, बल्कि सामाजिक संघर्ष, आत्मसम्मान और संविधानिक चेतना का प्रतीक है।
आजाद समाज पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष और सांसद चंद्रशेखर आज़ाद ने इस मुद्दे पर तीखी प्रतिक्रिया देते हुए सभी आंबेडकरवादी संगठनों से एकजुट होने की अपील की। उन्होंने कहा:
“हम मौत और जेल से डरने वाले नहीं हैं। बाबासाहेब की इस धरोहर की रक्षा के लिए हर कुर्बानी देने को तैयार हैं।”
उन्होंने राजनीतिक दलों से ऊपर उठकर बहुजन एकता की आवश्यकता पर जोर दिया और इसे “बाबासाहेब की विरासत बचाने की लड़ाई” बताया।
समाजवादी पार्टी से जुड़े संगठन ने भी जताया विरोध
समाजवादी पार्टी से संबद्ध संगठन आंबेडकर वाहिनी के महासचिव राम बाबू सुदर्शन ने भी इस प्रस्तावित कदम की कड़ी आलोचना की। उन्होंने इसे बहुजन समाज की “गरिमा, आत्मसम्मान और आस्था पर सीधा हमला” बताया।
सुदर्शन ने कहा:
“आंबेडकर महासभा परिसर में स्थापित बाबासाहेब की अस्थियां सिर्फ एक स्मारक नहीं हैं, बल्कि करोड़ों लोगों की भावनाओं और संघर्ष की प्रेरणा का केंद्र हैं।”
उन्होंने कहा कि उत्तर प्रदेश विधानसभा के ठीक सामने स्थित यह स्थल दलितों, पिछड़ों और संविधान में विश्वास रखने वाले लोगों के लिए अत्यंत भावनात्मक महत्व रखता है।
भाजपा सरकार पर लगाए गंभीर आरोप
राम बाबू सुदर्शन ने भाजपा की “डबल इंजन सरकार” पर आरोप लगाते हुए कहा कि बाबासाहेब को केवल जयंती के अवसर पर याद किया जाता है, जबकि उनकी विरासत और विचारों को कमजोर करने की कोशिश की जा रही है।
उनके अनुसार, ऐशबाग क्षेत्र में प्रस्तावित बदलाव सामाजिक न्याय और संविधानिक मूल्यों के खिलाफ है। उन्होंने इसे “एक सोची-समझी साजिश” करार दिया और चेतावनी दी कि बहुजन समाज इसे किसी भी कीमत पर स्वीकार नहीं करेगा।
आस्था, इतिहास और राजनीति का केंद्र बना मुद्दा
यह विवाद अब केवल प्रशासनिक निर्णय तक सीमित नहीं रह गया है। बहुजन संगठनों का कहना है कि बाबासाहेब की अस्थियां करोड़ों लोगों की आस्था का विषय हैं, इसलिए किसी भी बदलाव से पहले समाज की भावनाओं का सम्मान किया जाना चाहिए।
आने वाले दिनों में यह मुद्दा उत्तर प्रदेश की राजनीति और सामाजिक आंदोलनों में बड़ा रूप ले सकता है। बहुजन समाज स्पष्ट संदेश दे रहा है कि बाबासाहेब की विरासत से जुड़े किसी भी स्थल के साथ छेड़छाड़ उन्हें स्वीकार नहीं होगी।

jai bheem