जन्म: 14 फरवरी 1854 | निर्वाण: 20 दिसंबर 1896
14 फरवरी का दिन भारत के इतिहास में विशेष महत्व रखता है। यह माता भीमाबाई अंबेडकर की जयंती है, जिन्हें डॉ. भीमराव अंबेडकर की मां के रूप में जाना जाता है। भीमाबाई रामजी सकपाल, जिन्हें सब माता भीमाबाई कहते हैं, एक ऐसी महिला थीं जिन्होंने कठिनाइयों के बीच संतानें पालीं और समाज के निचले पायदान पर रहते हुए भी परिवार को मजबूत बनाया। आइए, उनकी प्रेरणादायक जीवन यात्रा को जानें।
भीमाबाई का जन्म और रामजी सकपाल से विवाह
भीमाबाई का जन्म 14 फरवरी 1854 को हुआ था। उनके पिता लक्ष्मण मुरबडकर ठाणे जिले के मुरबाद के निवासी थे और ब्रिटिश सेना में सूबेदार के पद पर कार्यरत थे। मात्र 13 वर्ष की उम्र में, 1867 में भीमाबाई की शादी 19 वर्षीय रामजी सकपाल से हुई। यह विवाह मुरबाद में संपन्न हुआ।
रामजी सकपाल ने 1866 के आसपास ब्रिटिश सेना की 106 सैपर्स एंड माइनर्स में सैनिक के रूप में प्रवेश किया। पहले वे मराठा प्लाटून में थे। रामजी बाद में सूबेदार बने और सामाजिक भेदभाव के बावजूद सम्मानजनक पद प्राप्त किया।
14 संतानें: बलराम, आनंदराव और भीमराव की कहानी
1891 तक रामजी और भीमाबाई के 14 बच्चे हुए। इनमें चार बेटियां – गंगा, रमा, मंजुला और तुलसा – जीवित रहीं। बेटों में बलराम, आनंदराव और सबसे छोटे भीमराव (डॉ. बाबासाहेब अंबेडकर) ही बचे। भीमराव 14वीं और अंतिम संतान थे, जिनका जन्म 14 अप्रैल 1891 को मध्य प्रदेश के महू छावनी में हुआ।
1888 में रामजी की पलटन महू पहुंची। यहां उन्हें सामान्य विद्यालय का प्रधानाध्यापक बनाया गया। यहीं भीमाबाई ने भीमराव को जन्म दिया। बच्चे का नाम भिवा, भीम या भीमराव रखा गया। परिवार महार जाति का था, जिसे उस समय अछूत माना जाता था। अंबडवे गांव (रत्नागिरी जिला, महाराष्ट्र) उनके पैतृक स्थान थे।
दलित परिवार का संघर्ष और भीमाबाई का बलिदान
अछूत होने के कारण परिवार को सामाजिक-आर्थिक भेदभाव सहना पड़ा। 1894 में रामजी सेवानिवृत्त होकर रत्नागिरी के दापोली ‘कैंप’ में बस गए। 1896 में वे सतारा चले गए और कबीर पंथ की दीक्षा ली। उसी साल, भीमराव के मात्र 5 वर्ष की उम्र में भीमाबाई का सिरदर्द से देहांत हो गया।
माता भीमाबाई अम्बेडकर पुरस्कार: सम्मान की परंपरा
भीमाबाई के सम्मान में ‘मातोश्री भीमाबाई अम्बेडकर पुरस्कार’ दिया जाता है। वे दलित समाज की प्रेरणा हैं।
भीमा माता को शत्-शत्-शत् प्रणाम! इस जयंती पर उनकी त्यागमयी जिंदगी से प्रेरणा लें।

भीमा माता को शत्-शत्-शत् प्रणाम!