नानक चंद रत्तू: संघर्ष से सेवा तक की प्रेरक शुरुआत
नानक चंद रत्तू का जन्म 6 फरवरी 1922 को पंजाब के होशियारपुर जिले के सकरुली गाँव में एक गरीब अद-धर्मी परिवार में हुआ था। उस समय के जाति-आधारित समाज में उन्हें अछूत माना जाता था, फिर भी उन्होंने हार नहीं मानी।
1938 में मैट्रिक पास करने के बाद उन्हें पंजाब में नौकरी नहीं मिली। अगस्त 1939 में वे उम्मीद लेकर दिल्ली आए और साक्षात्कार दिया, लेकिन चयन नहीं हुआ। जीवन यापन के लिए उन्होंने कई छोटी-मोटी नौकरियाँ कीं—मूवी थिएटर में काम किया और दिल्ली क्लॉथ मिल्स में गेटकीपर भी बने।
लगातार संघर्ष और मेहनत के बाद 1940 में उन्हें भारत सरकार के एक कार्यालय में लिपिक की नौकरी मिली। यही वह मोड़ था जिसने आगे चलकर उन्हें बाबा साहेब डॉ. भीमराव आंबेडकर के सबसे विश्वसनीय सहयोगियों में शामिल कर दिया।
भारतीय संविधान के निर्माता और देश के प्रथम कानून मंत्री डॉ. भीमराव आंबेडकर के जीवन में कई सहयोगियों ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, लेकिन जिन कुछ लोगों ने उनके सबसे निकट रहकर सेवा की, उनमें नानक चंद रत्तू का नाम विशेष सम्मान के साथ लिया जाता है। वे केवल एक निजी सहायक नहीं थे, बल्कि बाबा साहेब के विचारों को शब्द देने वाले एक समर्पित कर्मयोगी थे।
प्रारंभिक जीवन और दिल्ली आगमन
नानक चंद रत्तू का जन्म पंजाब में हुआ था। साधारण परिवार से आने वाले रत्तू जी बेहतर रोजगार की तलाश में दिल्ली आए। उस समय देश सामाजिक और राजनीतिक बदलाव के दौर से गुजर रहा था। दिल्ली पहुंचकर उन्हें डॉ. भीमराव आंबेडकर के कार्यालय में एक सरकारी कर्मचारी के रूप में काम करने का अवसर मिला—और यही उनके जीवन का निर्णायक मोड़ साबित हुआ।
धीरे-धीरे उनकी मेहनत, ईमानदारी और कार्यकुशलता ने बाबा साहेब का विश्वास जीत लिया। वे डॉ. आंबेडकर के सबसे करीबी और भरोसेमंद निजी सहायकों में शामिल हो गए।
बाबा साहेब के साथ अटूट संबंध
नानक चंद रत्तू केवल टाइपिस्ट या सहायक भर नहीं थे; वे बाबा साहेब के दैनिक जीवन और बौद्धिक कार्यों का महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुके थे। डॉ. आंबेडकर के व्यस्त कार्यक्रम, लेखन कार्य और राजनीतिक गतिविधियों के बीच रत्तू जी हर समय उनके साथ खड़े रहे।
जब डॉ. आंबेडकर ने कानून मंत्री पद से इस्तीफा दिया, तब भी रत्तू जी ने उनका साथ नहीं छोड़ा। यह उनकी निष्ठा और व्यक्तिगत समर्पण का सबसे बड़ा प्रमाण था। सरकारी जिम्मेदारियों से मुक्त होने के बाद बाबा साहेब ने अपने लेखन और बौद्ध अध्ययन पर अधिक ध्यान दिया—और इस दौर में रत्तू जी की भूमिका और भी महत्वपूर्ण हो गई।
महान कृतियों के मौन साक्षी
डॉ. आंबेडकर की कई अमर कृतियों के पीछे नानक चंद रत्तू का अथक परिश्रम छिपा है। उन्होंने बाबा साहेब की अनेक पांडुलिपियाँ टाइप कीं, जिनमें विशेष रूप से—
- “The Buddha and His Dhamma” (द बुद्ध एंड हिज़ धम्म)
- “Riddles in Hinduism” (रिडल्स इन हिंदुइज़्म)
जैसी महत्वपूर्ण रचनाएँ शामिल हैं।
कहा जाता है कि बाबा साहेब अक्सर देर रात तक काम करते थे और रत्तू जी पूरी लगन से उनके विचारों को टाइप करते रहते थे। वे केवल शब्द नहीं टाइप कर रहे थे, बल्कि एक नए भारत की वैचारिक नींव को आकार देने में सहभागी थे।
अंतिम वर्षों की सेवा
बाबा साहेब के जीवन के अंतिम वर्षों में उनका स्वास्थ्य लगातार गिर रहा था। इस कठिन समय में भी नानक चंद रत्तू ने पूरी निष्ठा, संवेदनशीलता और समर्पण के साथ उनकी सेवा की। वे केवल सहायक नहीं, बल्कि एक विश्वस्त साथी की तरह हर समय मौजूद रहे।
6 दिसंबर 1956 को जब डॉ. आंबेडकर का महापरिनिर्वाण हुआ, तब यह केवल देश ही नहीं, बल्कि रत्तू जी के लिए भी व्यक्तिगत रूप से अत्यंत दुखद क्षण था।
बाबा साहेब पर लेखन कार्य
महापरिनिर्वाण के बाद नानक चंद रत्तू ने बाबा साहेब की स्मृतियों और अपने अनुभवों को शब्दों में संजोने का महत्वपूर्ण कार्य किया। उन्होंने डॉ. आंबेडकर के जीवन पर किताबें लिखीं, जो 1990 के दशक में प्रकाशित हुईं।
इन पुस्तकों का महत्व इसलिए भी अधिक है क्योंकि वे किसी दूर के लेखक की नहीं, बल्कि उस व्यक्ति की आँखों-देखी गवाही हैं जो बाबा साहेब के सबसे करीब रहा। रत्तू जी के लेखन से हमें डॉ. आंबेडकर के व्यक्तित्व, कार्यशैली और मानवीय पक्ष को समझने में अमूल्य सहायता मिलती है।
व्यक्तित्व की विशेषताएँ
नानक चंद रत्तू के जीवन से कुछ महत्वपूर्ण गुण उभरकर सामने आते हैं:
- अटूट निष्ठा
- कार्य के प्रति अनुशासन
- विनम्रता और सादगी
- मिशन के प्रति समर्पण
- महान व्यक्तित्वों के साथ काम करने की क्षमता
उन्होंने कभी स्वयं को केंद्र में नहीं रखा, बल्कि जीवन भर बाबा साहेब के मिशन को आगे बढ़ाने में लगे रहे।
ऐतिहासिक महत्व
आज जब हम डॉ. भीमराव आंबेडकर की विरासत की बात करते हैं, तो नानक चंद रत्तू जैसे समर्पित सहयोगियों को याद करना भी उतना ही आवश्यक है। इतिहास अक्सर महान नेताओं को याद रखता है, लेकिन उनके पीछे खड़े कर्मयोगियों का योगदान भी उतना ही मूल्यवान होता है।
रत्तू जी ने न केवल बाबा साहेब के विचारों को सुरक्षित रखने में भूमिका निभाई, बल्कि आने वाली पीढ़ियों तक उन्हें पहुँचाने में भी महत्वपूर्ण योगदान दिया।
निष्कर्ष
नानक चंद रत्तू का जीवन हमें सिखाता है कि इतिहास केवल मंच पर खड़े नेताओं से नहीं बनता, बल्कि पर्दे के पीछे निष्ठा से काम करने वाले लोगों से भी बनता है। बाबा साहेब के प्रति उनकी अटूट सेवा, समर्पण और विश्वास उन्हें भारतीय सामाजिक इतिहास में एक विशिष्ट स्थान दिलाता है।
वे भले ही सुर्खियों में कम रहे हों, लेकिन बाबा साहेब के मिशन को आगे बढ़ाने में उनका योगदान सदैव स्मरणीय रहेगा।
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Jai BHeem