महाराजा सयाजीराव गायकवाड़ और डॉ. भीमराव अंबेडकर: शिक्षा और सामाजिक क्रांति की ऐतिहासिक कहानी

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भारत के सामाजिक इतिहास में कुछ घटनाएँ ऐसी होती हैं जो भविष्य की दिशा तय कर देती हैं। महाराजा सयाजीराव गायकवाड़ और डॉ. भीमराव अंबेडकर के बीच का संबंध भी ऐसी ही प्रेरणादायक कहानी है। यह संबंध दो महत्वपूर्ण साक्षात्कारों से जुड़ा है – पहला, महारानी जमनाबाई द्वारा सयाजीराव गायकवाड़ का चयन, और दूसरा महाराजा सयाजीराव द्वारा युवा भीमराव अंबेडकर को अमेरिका भेजने का निर्णय


1. महारानी जमनाबाई द्वारा सयाजीराव गायकवाड़ का चयन

1870 में मल्हारराव गायकवाड़ अपने भाई महाराजा खंडेराव की मृत्यु के बाद बड़ौदा राज्य के शासक बने। लेकिन उनका प्रशासन अत्यंत खराब था। उनकी विलासिता और भ्रष्ट प्रशासन से जनता और ब्रिटिश सरकार दोनों असंतुष्ट हो गए।

इतिहासकार स्टेनली राइस के अनुसार 1873 तक स्थिति इतनी खराब हो गई कि ब्रिटिश सरकार ने बड़ौदा दरबार में रेजिडेंट बदल दिया।

राज्य की आर्थिक स्थिति भी बेहद खराब थी। आय लगभग 94 लाख रुपये थी जबकि खर्च 171 लाख रुपये तक पहुंच गया था। इसमें से बड़ी रकम महाराजा की विलासिता और दरबारियों पर खर्च हो रही थी। किसानों में भारी असंतोष फैल गया था।

अंततः 19 अप्रैल 1875 को ब्रिटिश सरकार ने मल्हारराव को पद से हटा दिया।


नए उत्तराधिकारी की खोज

महाराजा खंडेराव और महारानी जमनाबाई की कोई संतान नहीं थी (सिवाय उनकी बेटी ताराबाई के)। इसलिए महारानी ने गायकवाड़ वंश की अन्य शाखाओं में उत्तराधिकारी की खोज शुरू की।

उन्हें पता चला कि गायकवाड़ वंश के संस्थापक दमाजी गायकवाड़ के दो पोते थे। बड़ौदा के सभी शासक बड़े पोते की वंशावली से थे, जबकि दूसरे पोते प्रतापराव की शाखा दूर के रिश्तेदारों में थी।

महारानी ने प्रतापराव की शाखा से उत्तराधिकारी चुनने का निर्णय लिया।


कवलाना गांव से बड़ौदा तक

महारानी के आदेश पर पुलिस कवलाना गांव (मुंबई से लगभग 300 किमी दूर) पहुंची। वहां काशीराम गायकवाड़ नाम के व्यक्ति के तीन बेटे थे:

  • गोपालराव
  • संपतराव
  • आनंदाराव

परिवार अत्यंत साधारण और गरीबी में जीवन जी रहा था।

उन्हें बड़ौदा लाया गया ताकि महारानी स्वयं लड़कों का साक्षात्कार कर सकें।

जब महारानी ने 12 वर्षीय गोपालराव से पूछा कि वह क्यों आया है, तो उसने आत्मविश्वास से उत्तर दिया:

“मैं महाराजा बनने आया हूँ।”

इस उत्तर ने महारानी को गहराई से प्रभावित किया।

27 मई 1875 को महारानी जमनाबाई ने गोपालराव को गोद लेकर उनका नाम सयाजीराव गायकवाड़ तृतीय रखा और उन्हें बड़ौदा का महाराजा घोषित किया।

इसके बाद सयाजीराव को एफ. एच. एलियट और सर टी. माधवराव जैसे महान शिक्षकों द्वारा विशेष प्रशिक्षण दिया गया।


2. महाराजा सयाजीराव और युवा भीमराव अंबेडकर की मुलाकात

सिंहासन पर बैठने के बाद महाराजा सयाजीराव गायकवाड़ ने बड़ौदा राज्य में अनेक सामाजिक और आर्थिक सुधार किए। वे एक प्रगतिशील और दूरदर्शी शासक माने जाते हैं।

लगभग 38 वर्ष बाद उनकी मुलाकात एक युवा छात्र से हुई — भीमराव अंबेडकर


मालाबार हिल में ऐतिहासिक मुलाकात

युवा भीमराव बड़ौदा राज्य की नौकरी में रहते हुए जातिगत भेदभाव का सामना कर रहे थे। उन्होंने मुंबई के मालाबार हिल पैलेस में महाराजा से मुलाकात की।

महाराजा पहले से ही उनकी प्रतिभा और संघर्ष के बारे में जानते थे।

करीब आधे घंटे की बातचीत के बाद महाराजा ने पूछा:

महाराजा: तुम कौन-सा विषय पढ़ना चाहते हो?

अंबेडकर: समाजशास्त्र, अर्थशास्त्र और विशेष रूप से सार्वजनिक वित्त।

महाराजा: इन विषयों का अध्ययन करके क्या करोगे?

अंबेडकर: इन विषयों के अध्ययन से मुझे अपने समाज की दयनीय स्थिति सुधारने के उपाय मिलेंगे।

महाराजा मुस्कराए और बोले:

“मैं तुम्हें अमेरिका भेजने की सोच रहा हूँ, क्या तुम जाओगे?”

अंबेडकर ने तुरंत उत्तर दिया:

“जी हाँ।”

महाराजा ने उन्हें आवेदन देने को कहा।


अमेरिका की छात्रवृत्ति

4 जून 1913 को अंबेडकर ने बड़ौदा राज्य के साथ एक समझौता किया।

  • उन्हें 20,434 रुपये की छात्रवृत्ति दी गई
  • पढ़ाई के बाद 10 वर्ष बड़ौदा राज्य की सेवा करनी थी

वे कोलंबिया विश्वविद्यालय (अमेरिका) पहुंचे और वहां उन्होंने अर्थशास्त्र में पीएचडी पूरी की।

उनकी प्रसिद्ध शोध थी:

“The Evolution of Provincial Finance in British India”

इस पुस्तक को उन्होंने समर्पित किया:

“बड़ौदा के महाराजा सयाजीराव गायकवाड़ को — जिन्होंने मेरी शिक्षा में सहायता की।”


3. बड़ौदा में भेदभाव और संघर्ष

1917 में भारत लौटने के बाद अंबेडकर बड़ौदा में नौकरी करने गए।

महाराजा ने उन्हें मिलिट्री सेक्रेटरी नियुक्त किया और आगे चलकर वित्त मंत्री बनाने की योजना भी थी।

लेकिन जातिगत भेदभाव के कारण उन्हें रहने तक की जगह नहीं मिली।

गहरे आहत होकर अंबेडकर अगस्त 1917 में बंबई लौट आए।


4. लंदन में पुनः मुलाकात

1930 में पहला गोलमेज सम्मेलन (Round Table Conference) लंदन में हुआ।

यहां महाराजा सयाजीराव गायकवाड़ ने देखा कि डॉ. अंबेडकर किस तरह दलितों के अधिकारों के लिए मजबूती से आवाज उठा रहे हैं।

इतिहासकार नरेंद्र जाधव के अनुसार:

महाराजा अंबेडकर के भाषण से इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने उनके सम्मान में विशेष भोज आयोजित किया।


5. अंबेडकर की कृतज्ञता

1950 में डॉ. अंबेडकर ने महाराजा के पोते को एक भावुक पत्र लिखा:

“वे मेरे संरक्षक और मेरे भाग्य के निर्माता थे… मैं उन पर गहरा ऋणी हूँ।”

अंबेडकर चाहते थे कि वे महाराजा सयाजीराव गायकवाड़ की जीवनी लिखें, लेकिन दुर्भाग्य से वे इसे पूरा नहीं कर पाए।


6. बुद्ध, फुले और सयाजीराव

डॉ. अंबेडकर के जीवन पर गौतम बुद्ध, ज्योतिबा फुले और सयाजीराव गायकवाड़ तीनों का गहरा प्रभाव था।

  • कृष्णाजी अर्जुन केलुसकर ने अंबेडकर को बुद्ध की जीवनी भेंट की थी।
  • यह पुस्तक बड़ौदा ओरिएंटल सीरीज से प्रकाशित हुई थी।

महाराजा सयाजीराव महात्मा ज्योतिबा फुले के विचारों से भी प्रभावित थे।

फुले ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक “शेतकऱ्याचा आसूड (Cultivator’s Whipcord)” का पाठ स्वयं महाराजा को सुनाया था।


निष्कर्ष

इतिहास में कुछ व्यक्तित्व ऐसे होते हैं जो दूसरों के जीवन की दिशा बदल देते हैं।

महाराजा सयाजीराव गायकवाड़ ने डॉ. अंबेडकर की शिक्षा का मार्ग प्रशस्त किया, और डॉ. अंबेडकर ने आगे चलकर करोड़ों वंचित लोगों के अधिकारों के लिए संघर्ष किया।

डॉ. अंबेडकर ने सही कहा था:

“जो लोग इतिहास को नहीं जानते, वे इतिहास नहीं बना सकते।”

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