बेबी कोंडिबा कांबले, जिन्हें स्नेहपूर्वक “बाबीताई” कहा जाता था, भारत की अग्रणी दलित नारीवादी लेखिकाओं में से एक थीं। वे महाराष्ट्र की महार जाति से थीं, जो वहाँ की सबसे बड़ी दलित समुदाय है। डॉ. भीमराव रामजी आंबेडकर के विचारों से प्रेरित होकर उन्होंने सामाजिक न्याय और समानता के लिए जीवनभर संघर्ष किया।
उनकी आत्मकथा “जिणं आमुचं” (अर्थ: हमारा जीवन) मराठी में किसी दलित महिला द्वारा लिखी गई पहली आत्मकथा मानी जाती है, और संभवतः किसी भी भारतीय भाषा में पहली दलित महिला आत्मकथा है।
प्रारंभिक जीवन
बाबीताई कांबले का जन्म 1929 में महाराष्ट्र के पुणे जिले के पुरंदर तालुका के वीरगांव गाँव में महार परिवार में हुआ।
उनके पिता मजदूर ठेकेदार थे, जबकि नाना और परनाना ब्रिटिश अधिकारियों के यहाँ बटलर के रूप में कार्य करते थे। पिता के अधिकतर बाहर रहने के कारण उनका बचपन ननिहाल में बीता।
उनकी दादी सीतावहिनी ने मृत पशुओं का मांस खाने की प्रथा के खिलाफ आंदोलन चलाया था। यह परिवार में सामाजिक चेतना का प्रारंभिक स्रोत बना।
बाबीताई ने एक ऐसे कन्या विद्यालय में पढ़ाई की, जो ब्राह्मणों द्वारा संचालित था। वहाँ उन्हें और अन्य दलित छात्राओं को भेदभाव और अलगाव का सामना करना पड़ा।
विवाह और पारिवारिक जीवन
चौथी कक्षा पास करने के बाद, मात्र 13 वर्ष की आयु में उनका विवाह कोंडिबा कांबले से हुआ। विवाह बिना किसी ब्राह्मण पुरोहित के सम्पन्न हुआ।
पति के साथ उन्होंने पहले अंगूर बेचने का छोटा व्यवसाय शुरू किया, फिर सब्ज़ियाँ बेचीं और बाद में एक किराना दुकान खोली, जहाँ मुख्यतः महार समुदाय के लोग ग्राहक थे।
दुकान पर बैठते समय वे अख़बार पढ़ती थीं, जो सामान पैक करने के लिए आते थे। यहीं से उन्होंने लिखना शुरू किया।
उनके 10 बच्चे हुए, जिनमें से तीन का बचपन में निधन हो गया। बाद में पूरा परिवार बौद्ध धर्म में दीक्षित हुआ और जीवनभर बौद्ध रहा।
लेखन कार्य
“जिणं आमुचं” (Jina Amucha)
यह उनकी आत्मकथा है, जो 1986 में प्रकाशित हुई। 1982–84 के बीच इसके अंश मराठी पत्रिका “स्त्री” में प्रकाशित हुए थे।
यह कृति दलित साहित्य की एक महत्वपूर्ण रचना मानी जाती है। इसमें उन्होंने महाराष्ट्र के महार समुदाय के जीवन, गरीबी, जातिगत भेदभाव, सामाजिक कुरीतियों और अंधविश्वासों का विस्तृत वर्णन किया है।
इस पुस्तक की विशेषता यह है कि इसमें दलित महिला दृष्टिकोण से जाति और पितृसत्ता दोनों की आलोचना की गई है।
उन्होंने न केवल सवर्ण समाज द्वारा किए गए अत्याचारों को उजागर किया, बल्कि दलित समाज के भीतर मौजूद पितृसत्तात्मक सोच की भी खुलकर आलोचना की।
इस पुस्तक का अंग्रेज़ी अनुवाद “The Prisons We Broke” (अनुवाद: माया पंडित) नाम से 2008 में प्रकाशित हुआ।
इसके अतिरिक्त यह पुस्तक हिंदी (“जीवन हमारा”), तमिल और फ्रेंच भाषाओं में भी अनूदित हुई।
अन्य रचनाएँ
उन्होंने मराठी में कविता संग्रह “मन बोलता” प्रकाशित किया, जो आंबेडकर के विचारों और महार समुदाय के सशक्तिकरण पर आधारित है।
इसके अलावा उन्होंने दलित जीवन से जुड़े कई लेख भी लिखे।
सामाजिक और आंदोलनकारी भूमिका
बाबीताई कांबले डॉ. आंबेडकर से गहराई से प्रभावित थीं और युवावस्था से ही दलित आंदोलन से जुड़ गईं।
वे फाल्टन की महिला मंडल की सक्रिय सदस्य थीं, जो दलित महिलाओं की शिक्षा और रोजगार के अधिकार के लिए कार्य करता था।
बाद में उन्होंने फाल्टन के पास निंबुरे गाँव में सामाजिक रूप से पिछड़े बच्चों के लिए एक सरकारी मान्यता प्राप्त आवासीय विद्यालय (आश्रमशाला) की स्थापना की।
निधन और विरासत
21 अप्रैल 2012 को 82 वर्ष की आयु में फाल्टन, महाराष्ट्र में उनका निधन हुआ।
वे अपने समुदाय में एक सम्मानित लेखिका और सामाजिक मार्गदर्शक के रूप में जानी जाती थीं। लोग उन्हें स्नेह से “ताई” (बहन) कहकर पुकारते थे।
उनका लेखन जाति और लिंग आधारित उत्पीड़न के जटिल संबंधों को समझने में आज भी महत्वपूर्ण है। वे दलित नारीवादी लेखन की अग्रदूत मानी जाती हैं।
पुरस्कार और सम्मान
🏆 मातोश्री भीमाबाई आंबेडकर पुरस्कार (2001)

jai bheem
namo buddhay
Nice