बैटल ऑनर ऑफ कोहिमा: #द_चमार_रेजिमेंट का स्थापना दिवस 1 मार्च 1943
भारतीय सैन्य इतिहास में 1 मार्च 1943 का दिन विशेष महत्व रखता है। इसी दिन ब्रिटिश भारतीय सेना के अंतर्गत चमार रेजिमेंट की स्थापना की गई थी। यह रेजिमेंट उन बहादुर सैनिकों का प्रतीक थी, जिन्होंने विपरीत परिस्थितियों में भी अदम्य साहस, अनुशासन और देशभक्ति का परिचय दिया।
चमार रेजिमेंट की स्थापना
द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान सेना को अधिक सैनिकों की आवश्यकता थी। इसी पृष्ठभूमि में 1 मार्च 1943 को चमार समुदाय के सैनिकों को संगठित कर “चमार रेजिमेंट” का गठन किया गया। यह कदम सामाजिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण था, क्योंकि उस दौर में जाति आधारित भेदभाव व्यापक रूप से मौजूद था। इसके बावजूद इस रेजिमेंट के सैनिकों ने अपने शौर्य से इतिहास रचा।
बैटल ऑफ कोहिमा और वीरता
1944 में लड़ी गई कोहिमा की लड़ाई (Battle of Kohima) द्वितीय विश्व युद्ध की सबसे भीषण लड़ाइयों में से एक थी। यह युद्ध भारत के उत्तर-पूर्व में जापानी सेना और मित्र राष्ट्रों के बीच लड़ा गया। इस लड़ाई को “पूर्व का स्टेलिनग्राद” भी कहा जाता है।
कोहिमा की रक्षा में भारतीय सैनिकों की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण रही। विभिन्न भारतीय इकाइयों के साथ-साथ चमार रेजिमेंट के सैनिकों ने भी मोर्चे पर साहस और बलिदान का परिचय दिया। कठिन भौगोलिक परिस्थितियों, सीमित संसाधनों और लगातार हमलों के बावजूद उन्होंने दुश्मन को पीछे हटने पर मजबूर किया।

सामाजिक और ऐतिहासिक महत्व
चमार रेजिमेंट का गठन केवल सैन्य दृष्टि से ही नहीं, बल्कि सामाजिक दृष्टि से भी एक ऐतिहासिक घटना थी। यह उस समय की सामाजिक संरचना को चुनौती देने वाला कदम था। इस रेजिमेंट ने यह सिद्ध किया कि वीरता, क्षमता और देशभक्ति किसी जाति या वर्ग की मोहताज नहीं होती।
हालांकि बाद में इस रेजिमेंट को भंग कर दिया गया, लेकिन इसके सैनिकों की बहादुरी और योगदान भारतीय इतिहास में सदैव स्मरणीय रहेंगे।

द्वितीय विश्व युद्ध और कोहिमा का संदर्भ
द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान भारत के उत्तर-पूर्व में लड़ी गई कोहिमा की लड़ाई (1944) को युद्ध का निर्णायक मोड़ माना जाता है। इस भीषण संघर्ष में भारतीय सैनिकों ने अद्वितीय साहस का परिचय दिया।
यद्यपि कोहिमा में विभिन्न भारतीय इकाइयों ने भाग लिया, उस दौर में गठित नई रेजिमेंटों का अस्तित्व स्वयं इस बात का संकेत था कि भारतीय समाज के विभिन्न वर्ग राष्ट्र और सैन्य कर्तव्य में सक्रिय भागीदारी निभा रहे थे।
सामाजिक और ऐतिहासिक महत्व
चमार रेजिमेंट का गठन केवल सैन्य आवश्यकता नहीं था, बल्कि सामाजिक दृष्टि से भी एक महत्वपूर्ण कदम था। उस समय जातिगत भेदभाव की गहरी जड़ें थीं, फिर भी इस रेजिमेंट के सैनिकों ने अपने कर्तव्य और साहस से यह सिद्ध किया कि वीरता और राष्ट्रसेवा किसी जाति या वर्ग की बपौती नहीं होती।
हालाँकि युद्ध के बाद इस रेजिमेंट को भंग कर दिया गया, लेकिन इसका ऐतिहासिक महत्व और सैनिकों का योगदान आज भी प्रेरणास्रोत है।
बर्मा की लड़ाई और चमार रेजिमेंट की भूमिका
द्वितीय विश्व युद्ध (1944–1945) का एक ऐतिहासिक अध्याय
द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान ब्रिटिश भारतीय सेना ने अपनी सैन्य शक्ति को बढ़ाने के लिए विभिन्न नई इकाइयों का गठन किया। इन्हीं में से एक थी चमार रेजिमेंट, जिसका गठन 1 मार्च 1943 को किया गया था। यह रेजिमेंट जातिगत आधार पर चमार समुदाय के सैनिकों से गठित की गई थी।
बर्मा अभियान में भागीदारी
चमार रेजिमेंट को 15 कोर (XV Corps) के अंतर्गत ब्रिगेडियर जी.एम. डायर की कमान में 268वीं भारतीय ब्रिगेड का हिस्सा बनाया गया। इस ब्रिगेड ने बर्मा (वर्तमान म्यांमार) में जापानी सेना के विरुद्ध अभियानों में भाग लिया।
बर्मा की लड़ाई (Burma Campaign) 1944–1945 के दौरान दक्षिण-पूर्व एशिया के मोर्चे पर निर्णायक संघर्षों में से एक थी। इस अभियान का उद्देश्य जापानी सेना को भारत-बर्मा सीमा से पीछे धकेलना और मित्र राष्ट्रों की स्थिति को मजबूत करना था।
नागालैंड और 1944 का अभियान
1944 के मध्य में रेजिमेंट की पहली बटालियन को नागालैंड क्षेत्र में शाही जापानी सेना के विरुद्ध लड़ने के लिए भेजा गया। यह अभियान व्यापक बर्मा युद्ध का हिस्सा था। उत्तर-पूर्व भारत और बर्मा की पहाड़ी एवं कठिन भौगोलिक परिस्थितियों में सैनिकों ने साहस और अनुशासन का परिचय दिया।

रसद और सैन्य सहयोग
रेजिमेंट ने केवल मोर्चे पर लड़ाई ही नहीं लड़ी, बल्कि XXXIII कोर की मशीन गन बटालियन को गोला-बारूद की आपूर्ति भी की। युद्ध के दौरान रसद (logistics) की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण होती है, और इस प्रकार का सहयोग सैन्य सफलता का आधार माना जाता है।
युद्ध के बाद और विमुद्रीकरण
द्वितीय विश्व युद्ध की समाप्ति के बाद ब्रिटिश भारतीय सेना में व्यापक विमुद्रीकरण (demobilization) किया गया। इसी प्रक्रिया के तहत चमार रेजिमेंट को भंग कर दिया गया। हालांकि इसका अस्तित्व अल्पकालिक रहा, लेकिन युद्धकालीन भूमिका इसे ऐतिहासिक महत्व प्रदान करती है।
नेताजी सुभाष चंद्र बोस और 1945 की घटना
बर्मा अभियान और दक्षिण-पूर्व एशिया के युद्ध क्षेत्र का संबंध नेताजी सुभाष चंद्र बोस और आज़ाद हिंद फौज (INA) की गतिविधियों से भी जुड़ा रहा।
23 अगस्त 1945 को टोक्यो रेडियो ने प्रसारित किया कि नेताजी सुभाष चंद्र बोस 18 अगस्त 1945 को ताइहोकू (वर्तमान ताइपेई, ताइवान) हवाई अड्डे के निकट विमान दुर्घटना में घायल हो गए थे। बताया गया कि उन्हें गंभीर रूप से झुलसने के बाद ताइहोकू सैनिक अस्पताल ले जाया गया, जहाँ उसी रात उनका निधन हो गया।
कर्नल हबीबुर रहमान के अनुसार, उनका अंतिम संस्कार ताइहोकू में किया गया और उनकी अस्थियाँ बाद में टोक्यो के रानकोजी मंदिर में रखी गईं। भारत के राष्ट्रीय अभिलेखागार के दस्तावेजों में भी 18 अगस्त 1945 की रात 9 बजे उनके निधन का उल्लेख मिलता है।
हालाँकि नेताजी की मृत्यु को लेकर इतिहास में विभिन्न मत और विवाद भी रहे हैं, परन्तु आधिकारिक अभिलेखों में विमान दुर्घटना का विवरण दर्ज है।
लैसोंग तक अग्रिम बढ़त और ‘वी’ फोर्स का सहयोग
कोहिमा अभियान के दौरान चमार रेजिमेंट को स्काउट्स के समर्थन के लिए लैसोंग (Laisong) तक आगे बढ़ने का आदेश दिया गया।
इस दौरान ‘V Force’ मुख्यालय ने मोर्चे पर तैनात सैनिकों को तेजी से आवश्यक सैन्य सामग्री उपलब्ध कराई। इनमें शामिल थे:
- सर्विस राइफलें
- थॉम्पसन और स्टेन सब-मशीन गन
- शॉटगन
- ग्रेनेड
- गोला-बारूद
- राशन
इस रसद और हथियारों की आपूर्ति ने अग्रिम पंक्ति में तैनात सैनिकों को मजबूती प्रदान की और मोर्चे पर उनकी क्षमता को बढ़ाया।
अन्य सैन्य इकाइयों के साथ समन्वय
कोहिमा अभियान में चमार रेजिमेंट ने कई अन्य सैन्य इकाइयों के साथ मिलकर कार्य किया। इनमें प्रमुख रूप से शामिल थीं:
- 158 इंडियन पायनियर कोर
- 159 मणिपुर लेबर कोर
- 138 मैकेनिकल ट्रांसपोर्ट प्लाटून
- जापानी पक्ष से जनरल मुतागुची की 33वीं डिवीजन
- 12 नेपाली सेना, 203 नेपाली यूनिट, गोरखा 201
- नॉरफ़ॉक रेजिमेंट (90, 131, 133)
- नॉर्थ कचीन लेवीज़ (North Kachin Levies)
- तथा अन्य सहयोगी इकाइयाँ
इन सभी इकाइयों के संयुक्त प्रयासों ने कोहिमा और इम्फाल क्षेत्र में मित्र राष्ट्रों की स्थिति को सुदृढ़ किया।
ऐतिहासिक महत्व
कोहिमा की लड़ाई केवल एक सैन्य संघर्ष नहीं थी, बल्कि यह भारत के उत्तर-पूर्व की सुरक्षा और द्वितीय विश्व युद्ध के एशियाई मोर्चे पर निर्णायक परिणाम का आधार बनी।
चमार रेजिमेंट की भूमिका यह दर्शाती है कि भारतीय सेना में विभिन्न समुदायों के सैनिकों ने समान रूप से साहस और योगदान दिया। यद्यपि युद्ध के बाद रेजिमेंट को भंग कर दिया गया, लेकिन कोहिमा में उसकी भागीदारी इतिहास का एक महत्वपूर्ण अध्याय है।
रेजिमेंट का परिचय
- सक्रिय अवधि: 1943–1946
- देश: ब्रिटिश भारत
- शाखा: भारतीय सेना
- प्रकार: पैदल सेना
- मुख्यालय: जबलपुर, मध्य प्रदेश
- रेजिमेंटल प्रतीक: बाइसन (चमारों का पारंपरिक पशु)
द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान अंग्रेजों ने भारतीय सेना का विस्तार किया, जिसके तहत विभिन्न “क्लास बटालियनें” बनाई गईं। इसी प्रक्रिया में चमार समुदाय के सैनिकों से चमार रेजिमेंट गठित की गई।
लैसोंग तक अग्रिम कार्रवाई
चमार रेजिमेंट स्काउट्स के समर्थन हेतु लैसोंग तक आगे बढ़ी। इस दौरान ‘V Force’ मुख्यालय ने तेजी से हथियार और रसद उपलब्ध कराए, जिनमें शामिल थे:
- सर्विस राइफलें
- थॉम्पसन और स्टेन सब-मशीन गन
- शॉटगन
- ग्रेनेड
- गोला-बारूद
- राशन
युद्ध सम्मान
प्रथम चमार रेजिमेंट को कोहिमा की लड़ाई (1944) के लिए युद्ध सम्मान प्राप्त हुआ।
इम्फाल की लड़ाई
जब जापानी सेना उत्तर-पूर्व भारत की सीमा तक पहुँच गई, तब चमार गश्ती दलों ने इम्फाल-कोहिमा सड़क के दक्षिण क्षेत्र में खोज अभियान चलाया। उन्होंने दुश्मन की छिपी और छलावरण वाली स्थितियों का पता लगाने में भूमिका निभाई।
रेजिमेंट की एक कंपनी ने चिंदविन नदी पार कर पूर्वी तट पर जापानी सेना के विरुद्ध कार्रवाई की। उस समय समाचार शीर्षक तक बने — “जापानी सेना के खिलाफ कार्रवाई में चमार बटालियन”।
अन्य अभियानों में सहभागिता (उल्लेखित)
रेजिमेंट का नाम निम्न अभियानों से भी जोड़ा जाता है:
- कामो की लड़ाई
- मंडला का युद्ध
- रंगून की लड़ाई
- सिंगापुर की लड़ाई
- बर्मा अभियान
युद्ध के बाद विघटन
द्वितीय विश्व युद्ध की समाप्ति के बाद ब्रिटिश भारतीय सेना में व्यापक कटौती की गई। इसी प्रक्रिया में 1946 में चमार रेजिमेंट को भंग कर दिया गया।
हालाँकि इसका अस्तित्व अल्पकालिक रहा, लेकिन उत्तर-पूर्व भारत और बर्मा मोर्चे पर इसकी भूमिका ऐतिहासिक अध्ययन का विषय बनी हुई है।
पुरस्कार और सम्मान
द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान चमार रेजिमेंट के सैनिकों ने विभिन्न अभियानों में भाग लेते हुए उल्लेखनीय साहस और कर्तव्यनिष्ठा का परिचय दिया। उनके योगदान को अनेक सैन्य अलंकरणों और सम्मानों से मान्यता मिली।
प्रमुख सैन्य अलंकरण
रेजिमेंट से संबंधित सैनिकों को निम्नलिखित सम्मान प्राप्त हुए:
- 5 ब्रिटिश साम्राज्य पदक (British Empire Medal)
- 3 सैन्य पदक (Military Medal)
- 3 मिलिट्री क्रॉस (Military Cross)
- 7 बर्मा स्टार (Burma Star 1941–45)
- 4 पैसिफिक स्टार (Pacific Star)
- 4 ब्रिटिश युद्ध पदक (War Medal 1939–45)
- 8 बार ‘Mentioned in Despatches’ (संदेशों में उल्लेखित)
- 1 युद्ध सम्मान (Battle Honour)
ये सम्मान रेजिमेंट की सक्रिय युद्ध भागीदारी और व्यक्तिगत वीरता के प्रमाण माने जाते हैं।
रेजिमेंटल प्रतीक और बैज
चमार रेजिमेंट का रेजिमेंटल प्रतीक बाइसन था, जो पारंपरिक पहचान से जुड़ा प्रतीक माना जाता था।
- 1943–1946 के दौरान रेजिमेंट का कंधे पर लगाया जाने वाला बैज (Shoulder Title) पीतल से बना होता था।
- इस पर घुमावदार शैली में “CHAMAR REGIMENT” अंकित रहता था।
यह कंधा शीर्षक रेजिमेंट की विशिष्ट पहचान का प्रतीक था।
हवलदार भगत राम का पदक समूह (1945)
रेजिमेंट के वीर सैनिकों में हवलदार भगत राम का नाम विशेष रूप से उल्लेखनीय है।
- वे हिमाचल प्रदेश (तत्कालीन पंजाब) के कांगड़ा जिले के चिनिहार गाँव के निवासी थे।
- उन्हें Military Medal (सैन्य पदक) से सम्मानित किया गया।
- इस पुरस्कार की घोषणा 12 जुलाई 1945 को ‘London Gazette’ में प्रकाशित हुई थी।
उनके पदक समूह में शामिल थे:
- सैन्य पदक (1945)
- बर्मा स्टार (1941–45)
- ब्रिटिश युद्ध पदक (1939–45)
यह सम्मान उत्तर-पूर्व भारत और बर्मा मोर्चे पर उनके साहसिक योगदान की मान्यता थी।
युद्ध सम्मान
प्रथम चमार रेजिमेंट को “कोहिमा की लड़ाई (1944)” के लिए युद्ध सम्मान प्राप्त हुआ।
कोहिमा का युद्ध द्वितीय विश्व युद्ध के एशियाई मोर्चे पर निर्णायक संघर्षों में से एक था। इस सम्मान ने रेजिमेंट की सक्रिय भागीदारी और प्रदर्शन को औपचारिक मान्यता प्रदान की।
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बैटल ऑनर ऑफ कोहिमा “#द_चमार_रेजिमेंट के स्थापना दिवस 1 मार्च 1943 की आप सभी को हार्दिक बधाई एवं मंगलकामनाएं।