कन्नगी और मुरुगेसन कौन थे?
अंतरजातीय विवाह के बाद क्यों हुई हत्या?
पुलिस जांच और सीबीआई की भूमिका
विशेष अदालत का 2021 का फैसलामद्रास हाईकोर्ट ने क्यों बदली मृत्युदंड की सजा?
सुप्रीम कोर्ट का 2025 का फैसला
जातिगत हिंसा और पुलिस की जवाबदेही
तमिलनाडु के कन्नगी–मुरुगेसन हत्याकांड में अंतरजातीय विवाह करने वाले दंपती की हत्या हुई थी। वर्ष 2021 में विशेष अदालत ने एक दोषी को मृत्युदंड और 12 अन्य को आजीवन कारावास दिया। बाद में मृत्युदंड आजीवन कारावास में बदल दिया गया। यह मामला जातिगत हिंसा और पुलिस की जवाबदेही पर गंभीर सवाल उठाता है।
प्रेम विवाह से नाराज था परिवार
तमिलनाडु के कुड्डालोर जिले में रहने वाले एस. मुरुगेसन दलित समुदाय से थे। डी. कन्नगी वन्नियार समुदाय से थीं। दोनों ने परिवार की सहमति के बिना 5 मई 2003 को पंजीकृत विवाह किया था।
मुरुगेसन ने केमिकल इंजीनियरिंग की पढ़ाई की थी। कन्नगी वाणिज्य की छात्रा थीं। दोनों अपना जीवन साथ बिताना चाहते थे। लेकिन उनका अंतरजातीय विवाह कन्नगी के परिवार को स्वीकार नहीं था।
जुलाई 2003 में दंपती की हत्या
अदालत में सामने आए घटनाक्रम के अनुसार, मुरुगेसन को पकड़कर प्रताड़ित किया गया। उनसे कन्नगी का ठिकाना पूछा गया। बाद में कन्नगी को भी वापस लाया गया।
8 जुलाई 2003 को दोनों को जबरन जहर दिया गया। इसके बाद उनके शव अलग-अलग स्थानों पर जला दिए गए। सुप्रीम कोर्ट ने इस अपराध की जड़ में जातिगत ऊंच-नीच की मानसिकता को पहचाना।
किसी वयस्क का जीवनसाथी चुनना परिवार की प्रतिष्ठा पर हमला नहीं है। इस घटना में सामाजिक दबाव ने दो युवाओं से उनका भविष्य छीन लिया। इसलिए इसे केवल पारिवारिक विवाद कहकर नहीं समझा जा सकता।
पुलिस की भूमिका पर उठे सवाल
इस मामले में शुरुआती पुलिस जांच भी विवादों में रही। पीड़ित पक्ष को न्याय के लिए लंबा संघर्ष करना पड़ा। मद्रास हाईकोर्ट के हस्तक्षेप के बाद जांच सीबीआई को सौंपी गई।
पीड़ित परिवार की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता पी. रथिनम ने कानूनी लड़ाई लड़ी। मुकदमे में गवाहों के मुकरने जैसी बाधाएं भी आईं। वर्ष 2021 की रिपोर्ट के अनुसार, अभियोजन के 81 गवाहों में से 36 मुकर गए थे।
यह स्थिति बताती है कि न्याय के लिए कानून के साथ गवाहों की सुरक्षा और निष्पक्ष जांच भी आवश्यक है।
विशेष अदालत ने क्या सजा दी?

24 सितंबर 2021 को विशेष न्यायाधीश एस. उत्तमराजा की अदालत ने 13 आरोपियों को दोषी ठहराया। इनमें कन्नगी के भाई डी. मरुथुपांडियन को मृत्युदंड मिला। अन्य 12 दोषियों को आजीवन कारावास दिया गया। दो आरोपी बरी हुए। आजीवन कारावास पाने वालों में दो पुलिस अधिकारी भी शामिल थे। इसलिए “एक को फांसी और 14 को जन्मटीप” का दावा सही नहीं है।
हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में क्या हुआ?
8 जून 2022 को मद्रास हाईकोर्ट ने मरुथुपांडियन का मृत्युदंड आजीवन कारावास में बदल दिया। दो दोषियों को बरी किया गया। पुलिस अधिकारी के.पी. तमिलमारन की सजा घटाकर दो वर्ष का कठोर कारावास की गई।
28 अप्रैल 2025 को सुप्रीम कोर्ट ने दोषियों की अपीलें खारिज कर दीं। अदालत ने मुरुगेसन के पिता और सौतेली मां को संयुक्त रूप से पांच लाख रुपये का अतिरिक्त मुआवजा देने का निर्देश भी दिया।
न्याय और सामाजिक बराबरी का सवाल
कन्नगी–मुरुगेसन की कहानी जातिगत भेदभाव के मानवीय परिणाम सामने लाती है। यह पुलिस की जिम्मेदारी और न्याय में होने वाली देरी पर भी विचार करने को मजबूर करती है।
समाज की गरिमा तभी सुरक्षित होगी, जब हर व्यक्ति की गरिमा सुरक्षित हो। प्रेम और विवाह के कारण किसी की हत्या को सम्मान से जोड़ना पीड़ितों के साथ अन्याय है।
संपादकीय तथ्य-जांच: “भारत में पहली ऐसी सजा”, “युवती के चाचा को फांसी”, “सीबीआई अधिकारी ने रिश्वत ली” और “चुकादे को संवेदनशील होने के कारण छिपाया गया” जैसे दावों की पुष्टि नहीं हुई है। इन्हें लेख में तथ्य के रूप में शामिल नहीं किया गया है। सुप्रीम कोर्ट का संबंधित निर्णय सार्वजनिक रूप से उपलब्ध है।
