बसपा की “एक नोट, एक वोट” नीति और नोटबंदी का असर

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चुनाव में “नोट और वोट” की बहस: बसपा की फंडिंग, नोटबंदी और मायावती की रणनीति

भारतीय राजनीति में चुनाव जीतने के लिए जनसमर्थन के साथ-साथ आर्थिक संसाधनों की भूमिका भी महत्वपूर्ण मानी जाती है। बहुजन समाज पार्टी (बसपा) लंबे समय से यह दावा करती रही है कि वह बड़े उद्योगपतियों या कॉरपोरेट घरानों के बजाय अपने समर्थकों और कार्यकर्ताओं के छोटे-छोटे योगदान से पार्टी का संचालन करती है। इसी संदर्भ में “एक नोट, एक वोट” का नारा पार्टी की पहचान बन चुका है।

“एक नोट, एक वोट” की अवधारणा

बसपा संस्थापक कांशीराम और बाद में पार्टी प्रमुख मायावती लगातार यह कहते रहे हैं कि पार्टी को आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनाने के लिए कार्यकर्ताओं और समर्थकों से चंदा लिया जाता है। पार्टी का मानना है कि छोटे-छोटे योगदानों से ही चुनावी खर्च और संगठन को मजबूती मिलती है। इसके लिए विभिन्न मूल्य के कूपन भी जारी किए जाते रहे हैं।

नोटबंदी और बसपा पर प्रभाव

8 नवंबर 2016 को केंद्र सरकार द्वारा लागू की गई नोटबंदी के बाद कई राजनीतिक दलों की आर्थिक गतिविधियों पर असर पड़ा। बसपा प्रमुख मायावती ने उस समय नोटबंदी का खुलकर विरोध किया था और इसे आम जनता तथा विपक्षी दलों के लिए नुकसानदायक बताया था।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2017 से ठीक पहले हुई नोटबंदी ने चुनावी माहौल को प्रभावित किया। हालांकि, बसपा के प्रदर्शन में गिरावट के पीछे केवल नोटबंदी को कारण मानना पर्याप्त नहीं माना जाता। संगठनात्मक चुनौतियां, बदलते सामाजिक समीकरण और अन्य राजनीतिक कारक भी महत्वपूर्ण रहे हैं।

फंडिंग और चुनावी राजनीति

भारत में चुनाव लड़ना काफी खर्चीला माना जाता है। अधिकांश बड़े दलों को उद्योगपतियों, कॉरपोरेट कंपनियों और विभिन्न स्रोतों से चंदा मिलता है। वहीं बसपा का दावा रहा है कि वह अपने समर्थकों के योगदान पर अधिक निर्भर रहती है। पार्टी का कहना है कि आर्थिक संसाधन मजबूत होने पर ही चुनावी गतिविधियों को प्रभावी ढंग से संचालित किया जा सकता है।

गरीब और वंचित वर्ग की राजनीति

बसपा का मूल आधार दलित, पिछड़े, शोषित और वंचित वर्ग रहे हैं। पार्टी का दावा है कि सत्ता में आने पर उसका उद्देश्य इन्हीं वर्गों के सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक अधिकारों को मजबूत करना है। इसी विचारधारा के तहत समर्थकों से आर्थिक सहयोग की अपील की जाती रही है।

निष्कर्ष

चुनावी राजनीति में धन और जनसमर्थन दोनों की अहम भूमिका होती है। बसपा की “एक नोट, एक वोट” की नीति उसके संगठनात्मक मॉडल का हिस्सा रही है। वहीं नोटबंदी के प्रभाव और 2017 के चुनाव में बसपा के प्रदर्शन को लेकर अलग-अलग राजनीतिक दलों और विश्लेषकों के अपने-अपने दृष्टिकोण हैं। इन मुद्दों पर राजनीतिक बहस लगातार जारी है।

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