महाराष्ट्र के रायगढ़ में मिलीं 2200 वर्ष पुरानी बौद्ध मूर्तियां

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महाराष्ट्र के रायगढ़ में मिलीं 2200 वर्ष पुरानी बौद्ध मूर्तियां

महाराष्ट्र के रायगढ़ में मिलीं 2200 साल पुरानी बौद्ध मूर्तियां | महामाया देवी, बुद्ध पदचिह्न और प्राचीन बौद्ध इतिहास

रायगढ़ (महाराष्ट्र): महाराष्ट्र के रायगढ़ जिले के कर्जत तालुका स्थित पटोल-पाली (Patol-Pali) गांव में हाल ही में एक अत्यंत महत्वपूर्ण पुरातात्विक खोज सामने आई है। यहां खेतों में खुदाई के दौरान लगभग 2000 से 2220 वर्ष पुरानी प्राचीन मूर्तियां और शिल्प अवशेष प्राप्त हुए हैं, जिन्हें विशेषज्ञ बौद्ध धर्म से जुड़ा मान रहे हैं। यह खोज न केवल महाराष्ट्र बल्कि पूरे भारत के प्राचीन बौद्ध इतिहास को समझने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।

महामाया देवी की दुर्लभ प्रतिमा मिली

मिली हुई मूर्तियों में सबसे महत्वपूर्ण शिल्प महामाया देवी का बताया जा रहा है, जो भगवान बुद्ध की माता थीं। इस शिल्प में दो हाथियों के मध्य एक स्त्री की आकृति उकेरी गई है। बौद्ध कला में यह प्रतीकात्मक प्रस्तुति अत्यंत महत्वपूर्ण मानी जाती है और बुद्ध के जन्म से जुड़े प्रसंगों का संकेत देती है।

विशेषज्ञों के अनुसार यह मूर्ति प्राचीन भारतीय बौद्ध कला की उत्कृष्ट परंपरा का प्रतिनिधित्व करती है।

बुद्ध पदचिह्न और अन्य बौद्ध शिल्प

महाराष्ट्र के रायगढ़ में मिलीं 2200 वर्ष पुरानी बौद्ध मूर्तियां

इस स्थल से केवल महामाया देवी की प्रतिमा ही नहीं, बल्कि भगवान बुद्ध के पदचिह्न (Buddhapada) तथा चीवरधारी महिला के शिल्प भी प्राप्त हुए हैं। प्रारंभिक बौद्ध कला में बुद्ध की प्रत्यक्ष मूर्ति के बजाय उनके पदचिह्न, धर्मचक्र और अन्य प्रतीकों का प्रयोग किया जाता था। इसलिए इन अवशेषों का मिलना इस क्षेत्र में प्राचीन बौद्ध गतिविधियों का महत्वपूर्ण प्रमाण माना जा रहा है।

सांची, भरहुत और पीतलखोरा से मिलती-जुलती कला शैली

पुरातत्व और इतिहास के जानकारों का कहना है कि पटोल-पाली में प्राप्त शिल्पों की बनावट और कला शैली मध्य प्रदेश के प्रसिद्ध सांची स्तूप, भरहुत स्तूप तथा महाराष्ट्र के पीतलखोरा बौद्ध गुफा समूह से काफी समानता रखती है।

यह समानता दर्शाती है कि लगभग दूसरी शताब्दी ईसा पूर्व से पहली शताब्दी ईसा पूर्व के दौरान कोंकण क्षेत्र भी बौद्ध धर्म और बौद्ध कला का एक सक्रिय केंद्र रहा होगा।

‘पाली’ नाम भी देता है ऐतिहासिक संकेत

इतिहासकारों का मानना है कि गांव के नाम में शामिल “पाली” शब्द भी विशेष महत्व रखता है। पाली भाषा प्राचीन बौद्ध साहित्य और त्रिपिटक की प्रमुख भाषा रही है। यद्यपि केवल नाम के आधार पर कोई अंतिम निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता, फिर भी यह क्षेत्र में प्राचीन बौद्ध सांस्कृतिक प्रभाव की संभावना को मजबूत करता है।

पहाड़ों में छिपी हो सकती हैं प्राचीन गुफाएं

स्थानीय इतिहास प्रेमियों और बौद्ध संगठनों का मानना है कि जहां ये मूर्तियां मिली हैं, उसके आसपास के पहाड़ी क्षेत्रों में अभी भी कई महत्वपूर्ण पुरातात्विक अवशेष छिपे हो सकते हैं। संभावना व्यक्त की जा रही है कि यहां प्राचीन बौद्ध गुफाएं, विहार या स्तूप अवशेष मौजूद हों।

इस कारण विशेषज्ञों ने महाराष्ट्र राज्य पुरातत्व विभाग से विस्तृत सर्वेक्षण और वैज्ञानिक खुदाई की मांग की है।

कोंकण क्षेत्र के बौद्ध इतिहास को मिल सकती है नई दिशा

रायगढ़ और कोंकण क्षेत्र पहले से ही कन्हेरी, कार्ला, भाजा, बेडसे और पीतलखोरा जैसी बौद्ध गुफाओं के कारण ऐतिहासिक रूप से महत्वपूर्ण रहे हैं। पटोल-पाली में मिली यह नई खोज इस क्षेत्र में बौद्ध धर्म के प्रसार, व्यापारिक मार्गों और सांस्कृतिक विकास के नए पहलुओं को उजागर कर सकती है।

यदि आगे की खुदाई में और अवशेष प्राप्त होते हैं, तो यह स्थान महाराष्ट्र के प्रमुख बौद्ध पुरातात्विक स्थलों में शामिल हो सकता है।

निष्कर्ष

पटोल-पाली गांव में प्राप्त लगभग 2200 वर्ष पुरानी बौद्ध मूर्तियां और शिल्प भारत की समृद्ध बौद्ध विरासत का महत्वपूर्ण प्रमाण हैं। महामाया देवी की प्रतिमा, बुद्ध पदचिह्न और अन्य शिल्प यह संकेत देते हैं कि प्राचीन काल में रायगढ़ क्षेत्र बौद्ध धर्म और कला का एक सक्रिय केंद्र रहा होगा।

अब सभी की निगाहें पुरातत्व विभाग की आगामी कार्रवाई पर टिकी हैं। यदि वैज्ञानिक अध्ययन और खुदाई आगे बढ़ती है, तो यह खोज भारतीय इतिहास के एक महत्वपूर्ण अध्याय को और अधिक स्पष्ट कर सकती है।

लेखक: Tushar Kumar
विषय: बौद्ध इतिहास | पुरातत्व | महाराष्ट्र | रायगढ़ | प्राचीन भारत

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