भारत के सामाजिक सुधार आंदोलनों में ई.वी. रामासामी “पेरियार” का नाम अत्यंत सम्मान के साथ लिया जाता है। पेरियार ने केवल जाति व्यवस्था और सामाजिक असमानता के खिलाफ ही संघर्ष नहीं किया, बल्कि महिलाओं की स्थिति सुधारने के लिए भी क्रांतिकारी विचार प्रस्तुत किए। उनके महिला संबंधी विचार उस समय के समाज के लिए अत्यंत प्रगतिशील और चुनौतीपूर्ण थे। उन्होंने महिलाओं को पुरुषों के बराबर अधिकार देने, उन्हें आत्मनिर्भर बनाने और समाज में सम्मानजनक स्थान दिलाने के लिए जीवनभर संघर्ष किया।
महिलाओं की समानता का सिद्धांत
पेरियार का मानना था कि महिला और पुरुष में कोई मौलिक अंतर नहीं है, सिवाय शारीरिक संरचना के। उन्होंने इस धारणा को खारिज किया कि महिलाएं पुरुषों से कमतर हैं या उनका मुख्य कार्य केवल घर संभालना है। उनके अनुसार, महिलाओं को शिक्षा, रोजगार और सामाजिक भागीदारी में समान अवसर मिलना चाहिए।
वे कहते थे कि जब तक महिलाओं को बराबरी का दर्जा नहीं मिलेगा, तब तक समाज में वास्तविक प्रगति संभव नहीं है। उन्होंने महिलाओं को हर क्षेत्र में आगे बढ़ने के लिए प्रेरित किया।
पितृसत्ता और धर्म की आलोचना
पेरियार ने पितृसत्तात्मक व्यवस्था और धार्मिक मान्यताओं की कड़ी आलोचना की। उनका मानना था कि कई धार्मिक ग्रंथ और परंपराएं महिलाओं को दबाने के लिए बनाई गई हैं। उन्होंने विशेष रूप से मनुस्मृति जैसे ग्रंथों का विरोध किया, जिनमें महिलाओं को अधीनस्थ माना गया है।
उन्होंने सवाल उठाया कि क्यों ‘पवित्रता’ (चास्टिटी) का बोझ केवल महिलाओं पर डाला जाता है, जबकि पुरुषों के लिए ऐसे नियम नहीं होते। पेरियार ने इन दोहरे मानदंडों को अन्यायपूर्ण और अमानवीय बताया।
आत्मसम्मान विवाह
पेरियार ने “आत्मसम्मान विवाह” की अवधारणा को बढ़ावा दिया, जो उनके सामाजिक आंदोलन का एक महत्वपूर्ण हिस्सा था। इस प्रकार के विवाह में:
- किसी पंडित या धार्मिक अनुष्ठान की आवश्यकता नहीं होती
- दहेज प्रथा का विरोध किया जाता है
- विवाह समानता और सहमति पर आधारित होता है
- विधवा विवाह और अंतरजातीय विवाह को स्वीकार किया जाता है
यह पहल महिलाओं को विवाह में स्वतंत्रता और सम्मान दिलाने की दिशा में एक बड़ा कदम था।
महिलाओं की शिक्षा और आर्थिक स्वतंत्रता
पेरियार का मानना था कि महिलाओं की मुक्ति का सबसे प्रभावी माध्यम शिक्षा है। उन्होंने महिलाओं के लिए शिक्षा को अनिवार्य बताया और कहा कि बिना शिक्षा के वे अपने अधिकारों के प्रति जागरूक नहीं हो सकतीं।
इसके साथ ही उन्होंने महिलाओं की आर्थिक स्वतंत्रता पर भी जोर दिया। उनका कहना था कि जब तक महिलाएं आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर नहीं होंगी, तब तक वे पुरुषों पर निर्भर रहेंगी और शोषण का शिकार बनेंगी।
प्रजनन अधिकार और जन्म नियंत्रण
पेरियार ने उस समय जन्म नियंत्रण और महिलाओं के प्रजनन अधिकारों की वकालत की, जब यह विषय समाज में वर्जित माना जाता था। उनका मानना था कि महिलाओं को यह अधिकार होना चाहिए कि वे कब और कितने बच्चे पैदा करें।
उन्होंने बार-बार कहा कि महिलाओं को केवल “बच्चे पैदा करने की मशीन” समझना गलत है। उन्हें अपने शरीर और जीवन के बारे में निर्णय लेने की पूरी स्वतंत्रता होनी चाहिए।
विवाह और परिवार की पुनर्व्याख्या
पेरियार ने पारंपरिक विवाह संस्था की भी आलोचना की। उनका मानना था कि कई बार विवाह महिलाओं के लिए बंधन और शोषण का माध्यम बन जाता है। उन्होंने कहा कि विवाह केवल सामाजिक दबाव या परंपरा के कारण नहीं, बल्कि प्रेम, सम्मान और सहमति के आधार पर होना चाहिए।
उन्होंने महिलाओं को तलाक का अधिकार देने का समर्थन किया और कहा कि यदि विवाह में सम्मान और खुशी नहीं है, तो उसे समाप्त करना गलत नहीं है।
महिलाओं को सामाजिक परिवर्तन का नेतृत्व
पेरियार ने महिलाओं को केवल पीड़ित के रूप में नहीं देखा, बल्कि उन्हें सामाजिक परिवर्तन का सशक्त माध्यम माना। उन्होंने महिलाओं से आह्वान किया कि वे अन्याय के खिलाफ आवाज उठाएं, अपने अधिकारों के लिए संघर्ष करें और समाज में बदलाव लाने में सक्रिय भूमिका निभाएं।
उनका विश्वास था कि यदि महिलाएं सशक्त होंगी, तो पूरा समाज सशक्त होगा।
आज के संदर्भ में पेरियार के विचार
आज जब हम 21वीं सदी में महिलाओं की स्थिति को देखते हैं, तो पेरियार के विचार अभी भी प्रासंगिक प्रतीत होते हैं। हालांकि महिलाओं ने शिक्षा, रोजगार और राजनीति में महत्वपूर्ण प्रगति की है, फिर भी कई क्षेत्रों में असमानता और भेदभाव मौजूद है।
दहेज प्रथा, घरेलू हिंसा, लिंग भेदभाव और सामाजिक प्रतिबंध आज भी पूरी तरह समाप्त नहीं हुए हैं। ऐसे में पेरियार के विचार हमें प्रेरित करते हैं कि हम एक ऐसे समाज का निर्माण करें जहां महिलाओं को पूर्ण समानता और सम्मान मिले।
पेरियार ई.वी. रामासामी के महिला संबंधी विचार भारतीय समाज में एक क्रांतिकारी परिवर्तन की नींव रखते हैं। उन्होंने महिलाओं को समानता, स्वतंत्रता और आत्मसम्मान का अधिकार दिलाने के लिए जो संघर्ष किया, वह आज भी प्रेरणादायक है।
उनकी सोच केवल महिलाओं के उत्थान तक सीमित नहीं थी, बल्कि वह पूरे समाज के विकास से जुड़ी हुई थी। पेरियार का मानना था कि जब तक महिलाओं को स्वतंत्र और सशक्त नहीं बनाया जाएगा, तब तक एक न्यायपूर्ण और समान समाज की कल्पना अधूरी रहेगी।
इसलिए आज आवश्यकता है कि हम उनके विचारों को समझें, उन्हें अपनाएं और एक ऐसे समाज के निर्माण की दिशा में आगे बढ़ें जहां हर महिला को सम्मान, स्वतंत्रता और समान अवसर प्राप्त हों।

jai bheem