1914 में अमेरिकी धरती पर लाला लाजपत राय और भीमराव अंबेडकर की ऐतिहासिक मुलाकात !

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साल 1914 की बात है। ‘पंजाब केसरी’ के नाम से मशहूर लाला लाजपत राय सेहत के बहाने अमेरिका आए थे। लेकिन उनके आने का मुख्य कारण था – भारतीय राजनीतिक स्वतंत्रता आंदोलन के लिए इंटरनेशनल सपोर्ट हासिल करना। उस समय अमेरिका में ‘इंडियन होम रूल’ और गदर पार्टी जैसी क्रांतिकारी गतिविधियां चल रही थीं।

लालाजी अमेरिका में रहने के दौरान कोलंबिया यूनिवर्सिटी की लाइब्रेरी में समय बिताते थे। वहां एक युवा स्टूडेंट रेगुलर पढ़ने आता था – शांत, गंभीर और अपनी पढ़ाई में डूबा हुआ। वह स्टूडेंट मुंबई का टैलेंटेड युवा भीमराव था।

प्रोफेसर सेलिगमैन और टैलेंटेड भीमराव

एक दिन, लालाजी से बात करते समय प्रोफेसर एडविन आर. ए. सेलिगमैन वहां आ गए। वह भीमराव के प्रोफेसर थे और लालाजी के अच्छे दोस्त थे। प्रोफेसर ने गर्व से परिचय कराया:

“लालाजी, ये हैं हमारे भीमराव — सिर्फ़ इंडियन स्टूडेंट्स में ही नहीं, बल्कि पूरे अमेरिका के स्टूडेंट्स में सबसे अच्छे।”

वो भीमराव आगे चलकर भारत के संविधान के आर्किटेक्ट बने — बी. आर. अंबेडकर।

इकोनॉमिक्स और सोशियोलॉजी पर एक चर्चा में भीमराव ने अपनी लॉजिकल पावर से लालाजी को इम्प्रेस किया। उस समय, वो सिर्फ़ 22-23 साल के थे।

आज़ादी से पहले सामाजिक बराबरी – भीमराव का पक्का इरादा

लाला लाजपत राय ने भीमराव को इंडियन आज़ादी की लड़ाई में शामिल होने के लिए मनाया। उन्होंने कहा:

“अंग्रेजों से आज़ादी मिलने के बाद, हम धार्मिक और सामाजिक भेदभाव को चुटकी बजाकर खत्म कर देंगे।”

लेकिन भीमराव का नज़रिया अलग था। उनका मानना ​​था कि सामाजिक बराबरी उतनी ही ज़रूरी है जितनी पॉलिटिकल आज़ादी। इसलिए, उन्होंने पढ़ाई को प्रायोरिटी दी।

1916 में, लालाजी ने अमेरिका में इंडियन स्टूडेंट्स काउंसिल बनाई, लेकिन भीमराव ने इसमें शामिल होने से मना कर दिया। वो जानते थे कि उनकी लड़ाई लंबी है — और पढ़ाई ही उनका सबसे बड़ा हथियार है।

क्या होता अगर भीमराव उस समय स्कूल छोड़ देते?

सोचिए —
क्या होता अगर बाबासाहेब उस समय स्कूल छोड़कर आंदोलन में शामिल हो जाते:

क्या भारत को दुनिया का सबसे अच्छा संविधान मिलता?

क्या समान अधिकार और सुविधाएं कानूनी तौर पर सुरक्षित होतीं?

क्या हिंदू कोड बिल के ज़रिए महिलाओं को समान अधिकार मिलते?

बाबासाहेब ने बहुत मुश्किलों के बावजूद अपनी पढ़ाई पूरी की और अपनी मज़बूत इच्छाशक्ति से करोड़ों पीड़ितों को न्याय दिलाया।

निष्कर्ष

अमेरिकी धरती पर ‘पंजाब केसरी’ को ‘विश्व केसरी’ से मिलवाया गया।

लालाजी क्रांति के प्रतीक थे, जबकि भीमराव विचार क्रांति के पायनियर थे।

बाबासाहेब अंबेडकर का जीवन हमें सिखाता है कि शिक्षा सबसे बड़ी क्रांति है।

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